उत्तर प्रदेश के झांसी मेडिकल कॉलेज में कोरोनावायरस (कोविड-19) की जांच शुरू हो गई है। यहां लैब में बुधवार को पहले दिन 13 सैंपल की जांच की गई। सभी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के सैंपल थे। डॉक्टरों की रिपोर्ट निगेटिव आई है। जल्द ही यहां एक और लैब स्थापित होगी। दरअसल, मेडिकल कॉलेज के एक जूनियर डॉक्टर की पत्नी इंदौर में कोरोना पॉजिटिव पाई गई थी। वह अपने पति के साथ कुछ दिन बिताने के बाद इंदौर गई थी। उसके बाद डॉक्टर पति समेत कई डॉक्टरों को क्वारैंटाइन कर दिया गया था।
कमिश्नर ने खुद बनाया मास्क; बोले- घर पर ही करें तैयार
प्रदेश में मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके चलते मास्क की डिमांड अचानक बढ़ गई है। लेकिन इसे आसानी से घर में ही बनाया जा सकता है। झांसी मंडल के कमिश्नर सुभाष चंद्र शर्मा ने एक वीडियो जारी किया है, जिसमें वे खुद मास्क बनाने की विधि बता रहे हैं। उन्होंने बताया कि रुमाल के दोनों और रबड़ बैंड लगाकर मास्क तैयार किया जा सकता है। रबड़ बैंड कानों में चुभे नहीं, इसके लिए इस पर कोई सूती धागा लपेट आ जा सकता है। ये किसी भी सूती कपड़े से बनाया जा सकता है। साफ मास्क पहनना जरूरी है। हर कोई अपने लिए घर में 2 मास्क तैयार कर ले। हर रोज मास्क को साबुन से धोएं और बदल बदल कर पहनते रहे। क्योंकि एक ही मास्क लगातार पहनना भी घातक हो सकता है।
भूखे पेट रहने को मजबूर शिल्पकार समाज, बच्चे मांग रहे दूध
कोरोना के खौफ के चलते शिल्पकार मजदूरों के सामने अब बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इनकी दुर्दशा प्रशासनिक अमले के दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। जहां जिला अधिकारी दावा कर रहे हैं कि सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए हर जरूरतमंद तक राशन पहुंचाया जा रहा है। वहीं, शिल्पकार बस्ती में रहने वाले लोग प्रशासन के इन दावों को सिरे से नकारते हुए खाने के नाम पर सिर्फ समाजसेवी संस्थाओं द्वारा लंच पैकेट बांटने की बात कर रहे हैं।
सीपरी बाजार थाना क्षेत्र स्थित आईटीआई के पास एक ऐसी बस्ती है, जहां पत्थरों को आकार दिया जाता है। शिल्पकार समाज के ये लोग पत्थरों से बने सामान को मेला, हाट और सड़क किनारे फुटपाथ पर बेचते हैं। यही व्यवसाय इनकी जीविका का सबसे बड़ा साधन है।
लेकिन लॉकडाउन के चलते इनका व्यवसाय पूरी तरह से चौपट हो गया। अब ये दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। इनका कहना है कि कुछ समाजसेवी संस्थाएं आती हैं जो लंच पैकेट देकर जाती हैं। इतने बड़े परिवार के लिए लंच पैकेट पर्याप्त नहीं होते हैं। अभी तक इनके पास कोई सरकारी मदद नहीं पहुंची है।
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