उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में भृगु विहार कॉलोनी की रहने वाली 82 वर्षीय विमला दिवान लॉकडाउन के बीच जरुरतमंदों के लिए खाना बनाने में जुटी हैं। सात सालों तक कैंसर से जूझते हुए उन्होंने मौत को मात दी है। विमला कभी पूड़ियां बनाती हैं तो कभी उनकी पैकेजिंग करती हैं। वे अपनी पेंशन का कुछ हिस्सा गरीबों की सेवा के लिए दान कर रही हैं। इस उम्र में उनके भीतर देशसेवा के जज्बे को हर कोई सराह रहा है।
कभी जीने का जज्बा नहीं हुआ कम
विमला दिवान पॉलिटिकल साइंस की लेक्चरर रही हैं। उन्होंने बताया कि, आजादी के बाद देश के विभाजन के समय वे अपने पिता के साथ 1947 में पाकिस्तान के लाहौर से भारत आयी थीं। उस समय 9 से 10 साल उम्र थी। बताया कि, साल 1993 में वो अचानक बीमार पड़ गईं और जांच में कैंसर निकला। 7 सालों तक विमला से कैंसर से लड़ाई लड़ी। इस दौरान उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और बच्चों को भी हताश नहीं होने दिया।
बेटे ने कहा- मां ने कभी नकरात्मक नहीं सोचा
उन्होंने बताया कि, कीमोथेरेपी की वजह से काफी कमजोर हो गयी थी। सारे बाल झड़ गए थे। लेकिन जीने का जज्बा बढ़ता गया। मैंने जीवन में जो कठिनाई झेली और देखी है, आज एक बार उसी हौसले के साथ कोरोना जैसी महामारी से लड़ने को तैयार हूं। बेटे सचिन दीवान ने बताया कि, मां बीमार होने के बाद भी लेक्चर के लिए विद्यालय जरुर जाती थीं। उनको कभी जीवन में निगेटिव सोचते नहीं देखा। कोरोना महामारी की चर्चा करते हुए उन्होंने ही प्रस्ताव दिया कि कॉलोनी के लोगो को बोलों कि, कुछ पैसे पेंशन से दे रही हूं। भूखे लोगों के लिए सभी लोग आगे आएं और खाना बनवाएं।
उनका हौसला हमारे लिए सीख
कालोनी निवासी आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि हम लोगों को विमलाजी की नेक पहल अच्छी लगी और आज हम लोग 300 लोगों का खाना बनवा रहे हैं। जिसका जितना सामर्थ हुआ, लोगों ने मदद किया। इस उम्र में उनका हौसला हमारे लिए एक सीख है।
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