Amazon

लॉफ्टर शो देख नकरात्मकता से हटाया ध्यान तो किसी ने अकेलेपन में अपने मां-बाप की मोहब्बत में लिख डाली कविताएं

'मैं अपनी अम्मी और अब्बू को दुनिया के सबसे दीनी इबादतगाह मक्का उमरा कराने गया था, लेकिन जब लौटा तो कोरोना पॉजिटिव हो चुका था। इस बात इल्म भी मुझे नहीं था। दो दिन बाद ही अम्मी को खांसी आने लगी। उनका टेस्ट हुआ तो कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी हुई। मेरा भी टेस्ट पॉजिटिव आया। लगा कि खुदा का कहर टूट पड़ा है। 21 दिन में कई ऐसे वक्त आए, जब लगा कि अब आखिरी वक्त आ गया है। लेकिन डॉक्टरों ने हमेशा जीने के लिए उत्साहित किया... ये अल्फाज उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के एक कोरोना को मात देकर लौटे युवक के हैं। घर लौटने के बाद मरीजों की जीवनशैली में बदलाव आए हैं।दैनिक भास्कर ने कोरोना को हराकर लौटे 3 शहरों के3 मरीजों से बातचीत की। एक रिपोर्ट...

पीलीभीत अब कोरोना मुक्त, आखिरी मरीज ने अस्पताल में लिखी कविताएं
पीलीभीत, उत्तर प्रदेश का इकलौता जनपद है जहां कोरोना के दो केस आए और दोनों संक्रमण से मुक्त हो चुके हैं। बीते सोमवार को आखिरी मरीज भी डिस्चार्ज होकर घर पहुंच गया। जिसके बाद जिला प्रशासन ने राहत की सांस ली है। मरीज ने दैनिक भास्कर से बातचीत में अपना नाम को प्रकाशित से मना किया। इसलिए यहां हम उसका नाम नहीं दे रहे हैं। युवक की मां भी संक्रमित थी, जोकि चार दिन पहले डिस्चार्ज होकर लौट आई है। 21 दिन कैसे बीते और अब उनकी जीवनशैली में क्या बदलाव आए हैं? मरीज ने अपना तजुर्बा दैनिक भास्कर से साझा किया।

बगल के वार्ड में थी मेरी मां, बिना देखे दूर से बात कर अपने दिल को दे रहा था तसल्ली

मैं अपनी अम्मी और अब्बू को लेकर 37 लोगों के साथ उमरा करने मक्का गया था। उस समय भी हमें कोरोना के बारे में जानकारी थी, लेकिन इतना भयानक होगा इसका अंदाजा नहीं था। 19 मार्च को जब हम लौटे तो अम्मी को हलकी फुल्की खांसी आ रही थी तो मैं उन्हें लेकर हॉस्पिटल चला गया। वहां उनका कोरोना का टेस्ट हुआ, जोकि पॉजिटिव आया। चूंकि मैं भी उनके संपर्क में था तो मेरा टेस्ट भी हुआ। तीन दिन बाद रिपोर्ट आई तो मैं भी पॉजिटिव पाया गया। जब मुझे पता चला तो लगा मेरे ऊपर खुदा का कहर टूट पड़ा हो। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि, मैं क्या करूं? मैं अपने अम्मी-अब्बू को बहुत चाहता हूं। उनसे दूर जाने का खौफ मुझे जीने नहीं दे रहा था। जैसे तैसे मै हॉस्पिटल पहुंचा। मैं बहुत मायूस था, लेकिन वहां हॉस्पिटल का स्टाफ उतना ही हौसलों से भरा हुआ था। मेरे पहुंचने पर सबने सबसे पहले मुझे हौसला दिया। एक अकेले कमरे में ले गए। बगल में मेरी मां का वार्ड था। लेकिन मुझे कमरे से बाहर जाने पर पाबन्दी थी।

कविताएं लिखने के लिए हॉस्पिटल स्टॉफ से मांगाथाकॉपी-पेन

डॉक्टर्स ने मेरा मोबाइल मुझसे ले लिया था, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि निगेटिव खबरें देखकर मेरा हौसला टूटे। क्योंकि उसमें खबरे लगातार आ रही थी कि आज इतने इन्फेक्टेड हो गए, आज यहां इतनी मौत हो गयी। ऐसे में अपना समय बिताने के लिए मैंने कॉपी और कलम की डिमांड की, जिसे हॉस्पिटल स्टाफ ने पूरा किया। दरअसल, डॉक्टर्स मेरी भावनाओं को समझ रहे थे कि अकेला है, इससे ही उसका टाइम पास होगा। उस कॉपी पर मैंने 21 दिन में कई अशआर अपने मां बाप की मोहब्बत में लिखे। कई बातें लिखी जो भी दिमाग में आ रही थी। हालांकि यह मेरे लिए पहला अनुभव था।

21 दिन में कई बार महसूस हुआ कि अब आया आखिरी वक्त

21 दिन में ऐसा भी वक्त आया जब मेरा हौसला टूटा और मुझे लगा अब मेरा आखिरी वक्त आ गया। तब मैंने डॉक्टर नितिन को बुलाया और अपनी हालत बताई। उन्होंने मुझे बहुत प्यार से समझाया कि आप हमेशा सकारात्मक रहो। कुछ सोचो ही मत। साथ ही आइसोलेशन वार्ड में थोडा घूम फिर लिया करो जिससे दिल बहल जाए। फिर मैंने अपना सारा समय अल्लाह की इबादत में लगाना शुरू कर दिया। मैं पांचों वक्त की नमाज पढता था। बगल के वार्ड में एडमिट अम्मी से जोर जोर से बात करता, क्योंकि मैं वहां जा नहीं सकता था। साथ ही कुछ दिनों में ही मुझे वह हॉस्पिटल का कमरा अपने घर जैसा लगने लगा और हॉस्पिटल का स्टाफ परिवार जैसा। मैंने अपनी कॉपी में हॉस्पिटल स्टाफ के लिए भी कविताएं लिखी हैं।

छुट्टी मिलने पर दी विदाई, मैंने सुनाई कविता तो आंखों से आंसू छलके

बीते सोमवार को जब मै हॉस्पिटल से निकला तो स्टाफ मुझे बाहर छोड़ने आया तो उनके सम्मान में मैंने दूर खड़े होकर उनके लिए लिखी कविता सुनाई। उस पल मेरी आंखों में आंसू आ गए। अब मैं अपने घर आ गया हूं और मुझे 14 दिन तक आइसोलेशन में रहना होगा। मैं एक कमरे में हूं। बाहर से ही मुझे खाना दिया जा रहा है। सब कुछ अभी हॉस्पिटल जैसा ही है। फ़िलहाल ये सब मेरे और मेरे परिवार के लिए ही है।

दिनचर्या में क्या बदलाव आया?

  • अब मैं सुबह कुछ देर योग करता हूं। जिसमे लंबी लंबी सांसे अंदर बाहर छोड़नी होती है।
  • मौसमी हरी सब्जियां खाना शुरू कर दी है, क्योंकि इससे इम्युनिटी बढ़ती है।
  • सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहा हूं। कम से कम 3 मीटर की दूरी पालन कर रहा हूं।


कोरोना से जंग जीतने वाला वाराणसी का पहला मरीज

17 मार्च को दुबई से लौटा और 18 मार्च को ट्रेन से वाराणसी फिर टेंपो से अपने गांव पहुंचा तो शाम तक हलकी खांसी और गले में खराश लगी। जिसके बाद हॉस्पिटल में दिखाया तो टेस्ट हुआ। 21 मार्च को टेस्ट पॉजिटिव आया। मुझे हॉस्पिटल में एडमिट कर दिया गया। एक अकेले कमरे में। मेरा डेढ़ साल का एक बच्चा भी है। जिसकी मुझे बहुत याद आती थी, लेकिन हॉस्पिटल स्टाफ ने मेरा कभी हौसला टूटने नहीं दिया। सबसे अच्छा रहा कि स्टाफ में मुझे अपना मोबाइल अपने पास रखने की अनुमति दे दी थी। जिसकी वजह से मैं खुद को बिजी रख पाता था।

बाबा रामदेव के योगा व कपिल शर्मा के शो देखकर बिताए दिन

मै न्यूज़, अखबारों का डिजिटल संस्करण वगैरह मोबाइल पर देखता था। दोपहर में एक मूवी देखता था। जब किसी से बात करने का मन होता तो खिड़की पर आ जाता बाहर कर्मचारी या किसी से भी इशारों में बात करता था। सोशल मीडिया वगैरह पर वक्त बिताता। स्टाफ से खूब बात करता। धार्मिक सीरियल, बाबा रामदेव के शो और कपिल शर्मा के शो खूब देखता था।

एक माह होम क्वारैंटाइन रहूंगा, यह मेरा निर्णय

21 मार्च को एडमिट होने के बाद तकरीबन 14 दिन हॉस्पिटल में बिताने के बाद मुझे 3 अप्रैल को घर भेज दिया गया है। फ़िलहाल अभी मैं 1 महीने तक घर में ही अलग कमरे में क्वारैंटाइन रहूंगा। यह मै खुद से कर रहा हूं, क्योंकि मैं अपने परिवार की सुरक्षा भी चाहता हूं।

दिनचर्या में क्या बदलाव आया?

  • कोरोना से संक्रमित होने के बाद मेरे आसपास का माहौल थोड़ा नकारात्मक हो गया था। डॉक्टर्स ने मुझे हमेशा सकारात्मक रहने की प्रेरणा दी। जिसकी वजह से मुझे इस बीमारी से लड़ने में मदद मिली।
  • मुझे लगता है जब यह महामारी देश दुनिया से खत्म हो जाएगी, तब भी सोशल डिस्टेंसिंग को फॉलो करना चाहिए। क्योंकि यह हमें सिर्फ कोरोना से नहीं दूसरी कई बीमारियों से बचा सकती है।
  • अब मेरे रूटीन में योग शामिल हो गया है। मैं सुबह मेडिटेशन करता हूं। ओम का उच्चारण करता हूं। यह खुद को शांत और स्वस्थ्य रखने का सर्वोत्तम तरीका है।

वह व्यक्ति जिसकी वजह से मेरठ में फैला था संक्रमण, अब जीत गया जंग

महाराष्ट्र के अमरावती से अपनी ससुराल मेरठ लौटे बुलंदशहर के एक व्यक्ति से 11 लोग बीमार हुए थे। इस परिवार के एक बुजुर्ग की मौत भी हो चुकी है। वहीं, पहले संक्रमित समेत 9 लोग अब कोरोना को मात देकर घर लौट चुके हैं। सभी कहते हैं कि, अब वे उन दिनों को याद करना नहीं चाहते, जो उन्होंने बीमारी के दौरान अस्पताल में गुजारे। बीमारी तो कोई भी हो उससे जितना बचा जा सके बचना चाहिए, यह तो कोरोना बीमारी थी, हम ठीक हुए है तो लग रहा है कि एक नई जिंदगी मिली है। सभी 9 लोगों को घर में अलग अलग कमरों में क्वारैंटाइन किया गया है।

एक बुरे सपने जैसा था, डॉक्टरों की सलाह का कर रहा हूं पालन
इनका कहना है कि अस्पताल में बिताएं दिन याद करना नहीं चाहते। वह एक बुरा सपने जैसा था। अस्पताल में इलाज कर रहे डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ ने पूरा सपोर्ट किया। उन्हें कभी यह अहसास नहीं होने देते थे कि वो बीमार हैं। समय से दवाई, नाश्ता, खाना देते थे। घर पर आकर भी डॉक्टरों द्वारा दी गई सलाह का ही पालन कर रहे हैं।

गर पता होता तो किसी जान जोखिम में नहीं डालता

छुटटी के बाद घर पहुंचे एक व्यक्ति का कहना है कि अस्पताल में गहरी नींद नहीं आती थी, घर पहुंच कर पहली रात सुकून से सोए, सुबह देर तक सोते रहे। सबसे पहले मेरठ में जो कोरोना पॉजिटिव पाया गया उसका कहना है कि यदि उसे पता होता कि वह संक्रमित है तो वह यहां कभी नहीं आता। कहा- मैं लोगों से यही कहना चाहूंगा कि लोगों को इस बीमारी से बचने के लिए सरकार जो कह रही है, डॉक्टर जो कह रहे हैं उसका पालन करना चाहिए। यह बीमारी जितनी जल्दी खत्म हो उतना अच्छा है। बीमारी खत्म होगी तभी लोग पहले जैसे सुकून से घूम फिर सकेंगे।

दिनचर्यामें क्या बदलाव आया?

  • खानपान अब थोड़ा बदल गया है। घर आकर अभी हल्का और प्रोटीन वाला खाना ही ले रहे हैं।
  • अंकुरित चने, दाल, रोटी, मूंग की दाल की खिचड़ी, दूध, कॉफी मुख्य रूप से खा रहा हूं। डॉक्टर्स ने बताया है कि इससे इम्युनिटी बढती है।
  • साथ ही अब ज्यादा से ज्यादा बार हाथ धो रहे हैं और सभी को इस बारे में बता भी रहे हैं।


Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
उत्तर प्रदेश में 21 दिनों के लॉकडाउन की अवधि में कोविड-19 के 646 संक्रमित मिल चुके हैं। इनमें 389 जमाती हैं। सबसे अधिक रोगी आगरा में 139 हैं। अब तक 9 रोगियों की मौत भी हो चुकी है। हालांकि, राहत की बात है कि, अब तक 49 मरीज ठीक होकर घर लौट चुके हैं। इन मरीजों पर अस्पताल कर्मियों ने पुष्पवर्षा कर तालियां बजाकर उन्हें घर भेजा है। इससे मरीजों के जीवन पर सकारात्मक असर भी पड़ रहा है। वे अब दूसरों को सरकार की गाइडलाइन का पालन करने के लिए जागरुक कर रहे हैं।


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2xhbJVL
via IFTTT

Post a Comment

0 Comments