कानपुर के बिकरूगांव में दो जुलाई की ऐसी स्याह रातथी, जिसने खाकी-अपराध के गठजोड़ का खुलासा किया बल्कि सिस्टम पर भी कालिख पोत दी। डीएसपी समेत आठ पुलिसकर्मियों का हत्यारा विकास दुबे अभी पकड़ से दूर है। उसे आसमान निगल या धरती, किसी को कुछ पता नहीं है। एसटीएफ और 40 थानों की फोर्स गली-गली और बीहड़ से लेकर नेपाल बॉर्डर तक सर्च अभियानचला रही है। उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि, चूक नहीं हुई बल्कि अफसरों से लेकर लोकल थाने की मिलीभगत है।इस बीच पुलिस की कार्यशाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। मुठभेड़ में मारे गए डीएसपी देवेंद्र के भाई कमलकांत का कहना है कि, जिस अफसर ने विकास दुबे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, अब वही एसटीएफ का हेड है। ऐसे में जांच का हश्र क्या होगा? यह तो समय बताएगा। ऐसे ही छह अनसुलझे सवाल हैं, जो सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं। एक रिपोर्ट...
- जिस एसएसपी ने नहीं की थी कार्रवाई, उसकी को मिली जांच
कानपुर के पूर्व एसएसपी अनंतदेव अब एसटीएफ के डीआईजी हैं। विकास दुबे के खिलाफ जांच एसटीएफ कर रही है। अनंत देव दो साल से ज्यादा समय तक कानपुर में एसएसपी रहे। मुठभेड़ में मारे गए डीएसपी देवेंद्र मिश्र ने उन्हें चौबेपुर थानेदार विनय तिवारी और विकास दुबे पर कार्रवाई के लिए 13 मार्च को पत्र लिखा था। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। कानपुर का पूरा खाकी सिस्टम इस बात से परिचित था कि, विकास दुबे के अपराध की फेहरिस्त कितनी लंबी है। लेकिन किसी के कानों में जूं नहीं रेंगी। अब बिकरू गांव में हुई वीभत्स घटना होने के बाद वहीं के अधिकारी मामले कीजांच में जुटे हैं। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि जांच का हश्र क्या होगा?
- थाने में घुसकर हत्या, मगर किसी पुलिसवाले नहीं दी गवाही
विकास दुबे ने साल 2001 में राजनाथ सिंह सरकार में मंत्री का दर्जा पाप्तसंतोष शुक्ला की शिवली थाने में घुसकर हत्या कर दी थी। इसके बाद उसने इस हत्याकांड में कोर्ट में सरेंडर किया। घटना के समय 20 पुलिसकर्मीथाने पर मौजूद थे। लेकिनसभी गवाही के समय मुकर गए। नतीजा कुख्यात बदमाश विकास दुबे जमानत पर बाहर आ गया। इसके बाद भी किसी अधिकारी ने मामले में कोई पैरवी नहीं की। साफ था कि पुलिस कर्मी उसे बचाने में जुटे थे।
- जो 500 कदम चल भी नहीं सकता, वह भागा कैसे?
जमीन के विवाद में सहारनपुर में विकास दुबे पर हमला हुआ था, जिसके बाद उसके दोनों पैरों में रॉड पड़ी है। कहा जाता है कि, वह ठीक से 500 मीटर पैदल भी नहीं चल सकता। इसके बावजूद उसने अपने गुर्गों के साथ आठ पुलिसकर्मियों की हत्या की और आराम से फरार हो गया। चार दिन बाद भी उसे तलाशा नहीं जा सकता है। अब ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि वह भागा है या उसे भगा दिया गया। लोकलपुलिस को जानकारी थी कि, वह ज्यादा पैदल और दौड़ नहीं सकता। समय रहते उसे घेरकर पकड़ा जा सकता था। लेकिन चौबेपुर थाने के प्रभारी रहे विनय तिवारी और उनकी टीम मुठभेड़ के वक्त पीछे रही। जब साथी पुलिस वाले गोली लगने से ढेर हो गए। उसके बाद भी विकास दुबे को घेरने का प्रयास नहीं किया गया।
- मुकदमा दर्ज करवाने वाला राहुल तिवारी कहां है?
छह बीघा जमीन को लेकर जिस राहुल तिवारीने गैंगस्टर विकास दुबे पर एफआईआर दर्ज करवाई थी। एनकाउंटर के बाद से ही फरार है। लेकिन पुलिस उसको भी अभी तक खोज नहीं पाई। आखिर राहुल तिवारी कहां है? याराहुल तिवारी को किसी ने छुपा रखा है?जब पुलिस राहुल तिवारी को नहीं खोज पा रही, तब कुख्यात बदमाश को कैसे खोजा जा सकतीहै? फिलहाल सवाल उठ रहे कि, विकास दुबे तक पहुंचने और पुलिस की मिलीभगत की पोल न खुल जाए इसके लिए पुलिस ने राहुल तिवारी को छुपा दिया है।
- डीएसपी ने मांगी थी पीएसी, कार्रवाई भी निचले स्तर के कर्मियों पर
डिप्टी एसपी देवेंद्र मिश्र ने एसएसपी से फोन करके दबिश के लिए पीएसी मांगी थी। लेकिन उन्हें मददनहीं मिली?बताया जा रहा है कि,ऐसा नहीं था। आठ पुलिस कर्मी शहीद हो गए। जांच का हवाला दिया जा रहा है। विकास दुबे से सांठगांठ होने के आरोपों के तहत चौबेपुर थाने के प्रभारी रहे विनय तिवारी और तीन अन्य को सस्पेंड किया जा चुका है।लेकिन क्या कानपुर के उच्च अफसर इस वारदात के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। क्या उनको इसका जिम्मेदार नहीं माना जाएगा? वहीं ना जाने कितने और घर के भेदी बैठे हैं, जिन पर जांच की आंच तक नहीं पहुंच रही है।
- अपराधी के गुर्गों तक नहीं पहुंच पा रही पुलिस
विकास दुबे का 30सालों तक जिस तरह से जरायम की दुनिया में 'विकास' हुआउससे तो साफ है कि उसे पकड़ना इतना आसान नहीं है। लेकिन पुलिस की टीमें उसके गुर्गों तक भी नहीं पहुंच पा रही।जिससे विकास दुबे पर दबाव बन सके। हालंकि पुलिस अधिकारी इस बात पर अपनी पीठ थपथपा कर दवा कर रहे हैं कि उन्होंने ने विकास दुबे के दो साथियों को मार गिराया है। जबकि उसके खास को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रहे हैं।
क्या कहते हैं पूर्व डीजीपी?
उत्तर प्रदेश केपूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि इस पूरे मामले में पुलिस की चूक नहीं, बल्किमिलीभगत सामने आई है। जब थाने में हत्या करने के बाद बदमाश कोर्ट से बरी हो जाता है और उसके मामले में किसी पुलिस कर्मी की गवाही देने की हिम्मत नहीं हुई। इतनेबड़ेबदमाश के बरी होने के बाद भीहाई कोर्ट में अपील तक नहीं कि गई इसका मतलब साफहै। इसमें जिले के अफसर से लेकर थाने के पुलिस कर्मियों की मिलीभगत है। विकास दुबे का यूपी में होना मुश्किल है।अपराधी यूपी से बाहर जा चुका है। कहा कि, इतनी बड़ी घटना के पीछे पुलिस कीचूक नहीं है। बल्कि सोची समझी साजिश है। उनका कहना है कि विकास दुबे के पकड़े जाने से कई चेहरे बेनकाब हो जाएंगे। यही वजह है कि उस तक कानून के हाथ नहीं पहुंच रहे हैं।
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