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पोशाक कारोबारियों को 100 करोड़ का नुकसान, 80 से ज्यादा फैक्ट्रियों में 1 महीने पहले शुरू हुआ काम; ज्यादातर मुस्लिम कारोबारी प्रभावित

वैश्विक महामारी कोरोनावायरस के बीच पहली बार कृष्ण जन्मोत्सव बिना भक्तों के मनाया जा रहा है। इस खास मौके पर लोग अपने आराध्य ठाकुरजी को रंग बिरंगी पोशाक पहनाते हैं। लेकिन कोरोना के चलते इस बार यह कारोबार चौपट हो गया है। इस उद्योग को करीब 100 करोड़ का नुकसान हुआ है। वृंदावन में कृष्णा के पोशाक कारोबार से ज्यादातर मुस्लिम कारीगर जुड़े हुए हैं। यहां से पोशाकें विदेशों तक भेजी जाती हैं। तीन महीने के लॉक डाउन के बाद कारीगरों को उम्मीद थी कि मथुरा के देवालयों के द्वार खुलेंगे, साथ ही जन्माष्टमी से भी आस थी। लेकिन मथुरा कृष्णा भक्तों के लिए सील हो गयी। मंदिर में भी स्थानीय भक्त भी नहीं जा सकते हैं। ऐसे में उनकी रही सही उम्मीद भी टूट गयी है।

कारीगर अनीस।

देश विदेश में भेजी जाती है यहां से बनी पोशाक

वृंदावन का राधा निवास मोहल्ला...यहां लगभग हर घर में ठाकुर जी की पोशाक बनाने का काम होता है। हम अनीस के घर में गए तो सिर पर टोपी लगाए बनियान पहने अनीस चारपाई पर कसे हुए कपड़े पर सुई से आकर्षक आकृतियां उकेर रहे थे। बगल में उनके साथ परिवार के कुछ और सदस्य भी लगे हुए थे। अनीस ने बताया कि एक चादर पूरी करने में कभी पूरा दिन लग जाता है। कढ़ाई ज्यादा हो तो उससे भी ज्यादा समय लग जाता है। अनीस के मुताबिक अबकी बार काम एक दम नहीं है। उन्होंने बताया कि महीने में 25 से 30 हजार की कमाई भी बमुश्किल हो रही है।

फखरुद्दीन।

3 महीने पहले शुरू होती थी तैयारियां, अबकी 1 महीने पहले शुरुआत हुई

बगल घर में रहने वाले फखरुद्दीन बताते है कि जन्माष्टमी की तैयारी हम लोग तीन महीने पहले से शुरू कर देते थे। इतना आर्डर रहता था कि कुछ तो पूरे भी नही हो पाते थे। लेकिन इस बार कोरोना की वजह से सब फीका पड़ गया है। अभी एक महीने पहले इसी आस में पोशाक बननी शुरू हुई थी कि जन्माष्टमी पर कुछ कारोबार हो जाएगा। लेकिन अब उस पर भी रोक लग गयी है। जन्माष्टमी के बाद हम लोगों का कारोबार भी बन्द ही हो जाएगा। उन्होंने कहा जहां मथुरा से 80 से 100 करोड़ का पोशाक का कारोबार होता था वहीं यह सिमट कर अब 10% राह गया है।

दुकानदार पीयूष।

कोरोना की वजह से बिजनेस हुआ चौपट, 5% का कारोबार भी नही है

वृंदावन में पोशाक की दुकान चलाने वाले पीयूष बताते हैं कि मेरे परिवार की तीसरी पीढ़ी अब इस दुकान को संभाल रही है। मेरे दादा ने शुरुआत की थी। अब मैं बैठ रहा हूं। हम ठाकुर जी के साज-ओ-श्रृंगार का हर समान बेचते हैं। लेकिन ऐसी मंदी कभी नहीं देखी। उस समय दुकान पर 5% ग्राहक भी नही आ रहे हैं। वरना पिछले साल वृंदावन की गलियों में पैर रखने की जगह नही थी। पूरा मार्किट धराशायी हो गया है।



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यह तस्वीर वृंदावन की है। यहां घर घर में कान्हा की पोशाक व उनके श्रृंगार के सामान तैयार किए जाते हैं। लेकिन इस बार कोरोनावायरस के चलते उनका यह कारोबार ठप रहा।


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